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भारत के महान एवम दिव्य संत- श्री स्वामी विवेकानंदजी {Hindi & English}

भारत के महान एवम दिव्य संत- श्री स्वामी विवेकानंदजी {Hindi & English}

Om-Shiva

स्वामी श्री विवेकानंदजी अपने बचपन से ही अन्य बच्चों की तुलना में बहुत ज्यादा होशियार थे। शारीरिक शिक्षा की बात करें या खेलकूद का क्षेत्र हो यहां भी उनकी पूर्ण रुचि बनी रहती थी। बचपन से ही उनके अंदर यह दैवीय गुण विद्यमान था कि वह हमेशा सत्य की पालना पर डटे ही रहते थे। एक बार की बात है जब भूगोल की कक्षा में अध्यापक ने उनसे एक प्रश्न पूछा। जिसका ठीक उत्तर विवेकानंदजी ने दिया। ठीक उत्तर देने के पश्चात भी अध्यापक ने उनके उत्तर को गलत ठहराते हुए उन्हें दंड दिया। जब विवेकानंदजी अपने घर आए तो उन्होंने भूगोल की कक्षा में हुई इस घटना का सारा वृत्तांत अपनी माता को सुनाया। उनकी माता ने कहा- ‘पुत्र, यदि तुम सही हो तो अपने सत्य के ऊपर डटे रहो।’ अगले दिन विवेकानंदजी ने अपने अध्यापक के सामने अपनी बात को रखा। उनके अध्यापक को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने अपनी भूल स्वीकार करी।

स्वामी विवेकानंद जी की अत्यधिक रुचि पुस्तकों के अध्ययन में बनी ही रहती थी। प्राकृतिक रूप में उनकी पुस्तकों को पढ़ने की गति अति तीव्र थी। उनके साथी पुस्तकालय से उनके अध्ययन के लिए बड़ी मोटी-मोटी किताबें लाते थे। एक दिन लाइब्रेरियन ने विवेकानंदजी के साथियों से पूछा- ‘क्या स्वामी विवेकानंदजी यह सभी किताबें असलियत में पढ़ते हैं? या केवल पढ़ने का नाटक मात्र करते हैं?’ इस बात को सुनते ही विवेकानंदजी स्वयं पुस्तकालय में गए। उन्होंने लाइब्रेरियन से किसी भी किताब से प्रश्न पूछने को कहा। लाइब्रेरियन ने स्वामीजी से अनेकों प्रश्न पूछे और स्वामीजी ने सभी प्रश्नों का बिल्कुल सही उत्तर उनको दिया। स्वामीजी की इस आश्चर्यचकित प्रतिभा को देखकर लाइब्रेरियन चकित रह गया और उसने विवेकानंदजी से क्षमा मांगी।

एक बार की बात है जब स्वामीजी ट्रेन से यात्रा कर रहे थे। ट्रेन में एक फेरीवाला उबले हुए चने बेच रहा था। स्वामीजी ने अपने साथियों से कहा- देखो उबला हुआ चना हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा रहता है। इसलिए आप सभी थोड़े उबले हुए चने खरीद लीजिए। स्वामीजी के साथी उनके स्वभाव को बहुत अच्छे तरीके से जानते थे। इसलिए उन्होंने एक पैसे के चने खरीदकर चार गुना अधिक पैसे दे दिए। इसके पश्चात भी स्वामीजी बोले- ‘अरे भाई इतने कम पैसे में में उसका घर कैसे चल पाएगा? उसे पूरे 02₹ दे दो। स्वामी विवेकानंदजी की उदारता तो देखिए चने वाले को एक पैसे के चनों की कीमत के बदले 02₹ दे दिए ।

स्वामी विवेकानंदजी अपनी मातृभूमि के भी सच्चे भक्त थे। एक बार जब वह विदेश की यात्रा से भारत आ रहे थे। उनके साथ में 02 व्यक्ति थे जो ईसाई धर्म से संबंध रखते थे। कुछ बातचीत शुरू हुई तो हिंदू धर्म और ईसाई धर्म के मध्य तुलना होने लगी। विवेकानंदजी ने उनसे हिंदू धर्म के बारे में तर्क चर्चा करी। उन दोनों के पास स्वामीजी के तर्कों का कोई भी उत्तर नहीं था। स्वामीजी के तर्कों को अपनी निंदा समझते हुए उन दोनों ने हिंदू धर्म और उसके अनुयायियों को भला बुरा कहना शुरू कर दिया। तो स्वामीजी बिल्कुल शांत चित होकर बैठे रहे। इस पर भी जब वह दोनों व्यक्ति चुप नहीं हुए तो स्वामीजी से रहा नहीं गया। उन दोनों में से जो बहुत अधिक बोल रहा था उसका कॉलर पकड़ते हुए स्वामी जी ने कहा- ‘मेरे धर्म की निंदा आपने बहुत कर ली अगर इस क्षण के पश्चात आपने मेरे हिंदू धर्म की निंदा करी तो मैं आपको जहाज से नीचे फेंक दूंगा।’ शांत स्वभाव में बैठे हुए स्वामीजी का अचानक से यह परिवर्तन देखकर दोनों व्यक्ति डरते हुए उनसे क्षमा प्रार्थना करने लगे।

यात्रा से वापसी आने पर स्वामीजी ने जब यह जहाज वाली घटना अपने मित्र को सुनाई तो उनका मित्र उनसे कहने लगा- ‘कि आप तो एक संन्यासी हो आपको ऐसा उग्र व्यवहार शोभा नहीं देता है। इस पर स्वामीजी ने अति दृढ़ता से कहा- ‘यह धरती और इसकी संस्कृति मेरी माता है। जो कोई भी इसका अपमान करेगा मैं उसे कदापि क्षमा नहीं करूंगा। प्रथम मैं अपने भारत राष्ट्र की दिव्य भूमि का पुत्र हूं, इसके पश्चात मैं एक संन्यासी हूं।’ स्वामीजी का यह कथन हम सभी भारतवासियों के लिए सदा एक आदर्श के रूप में जीवंत बना रहेगा।

खेतड़ी के राजा जोकि स्वामीजी के अति प्रिय मित्र थे। उन्होंने स्वामीजी के स्वागत में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। उसने एक दरबार सजाया जिसमें एक गायिका को नृत्य संगीत के लिए बुलाया। अब स्वामीजी एक संन्यासी होकर भला नृत्य संगीत कैसे देख पाते? इस बात का विचार करते हुए स्वामीजी सभा में गए ही नहीं। इस बात का पता जब उस गायिका को लगा तो वह अत्यंत दुखी हुई। उसने अति करुणा भरे स्वर में ‘प्रभु मोरे अवगुण चित ना धरो’ गीत गाना प्रारंभ किया। यह गीत स्वामीजी के कान में पड़ा तो उनकी अंतर चेतना ने उनसे कहा- कि एक संन्यासी को मनुष्यों के अंदर भेद करना शोभा नहीं देता है। स्वामीजी उसी क्षण सभा में गए और सभा की समाप्ति के पश्चात उस गायिका को ‘माता’ कहकर सम्मानित किया।

आशा है कि आप सभी को हमारे महान संत श्री स्वामी विवेकानंदजी की पावन लीलाओं का कुछ अंश पढ़कर अत्यंत सुख पहुंचा होगा। कृपया कमेंट्स के माध्यम से श्रेष्ठ संतजनों के श्री चरणों में प्रणाम अवश्य करें।

आभार एवम धन्यवाद।

– गुरु सत्यराम

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Great and Divine Saint of India – Shri Swami Vivekanand Ji {Hindi & English}

Om-Shiva

Swami Shri Vivekanand Ji was much more intelligent than other children since his childhood. Whether it was physical education or the field of sports, he was fully interested in it. Since childhood, this divine quality was present in him that he always remained firm on the path of truth. Once, in the geography class, the teacher asked him a question. Vivekanand Ji gave the correct answer to it. Even after giving the correct answer, the teacher punished him by declaring his answer as wrong. When Vivekanand Ji came home, he narrated the entire incident that happened in the geography class to his mother. His mother said – ‘Son, if you are right, then keep firm on your truth.’ The next day Vivekanand Ji put his point in front of his teacher. His teacher realized his mistake and accepted it.

Swami Vivekanand Ji always had a keen interest in reading books. Naturally, his speed of reading books was very fast. His companions used to bring big thick books from the library for him to study. One day the librarian asked Vivekanand Ji’s companions- ‘Does Swami Vivekanand Ji actually read all these books? Or does he only pretend to read?’ On hearing this, Vivekanand Ji himself went to the library. He asked the librarian to ask him questions from any book. The librarian asked Swami Ji many questions and Swami Ji answered all the questions correctly. The librarian was astonished to see this astonishing talent of Swami Ji and he apologized to Vivekanand Ji.

Once Swami Ji was travelling by train. A hawker was selling boiled gram in the train. Swami Ji said to his companions- Look, boiled gram is very good for our health. So all of you buy some boiled gram. Swami Ji’s companions knew his nature very well. So he bought gram for one paisa and paid four times more money. Even after this Swamiji said- ‘Oh brother, how will he be able to run his house with such less money? Give him the full 2 rupees. See the generosity of Swami Vivekananda, he gave 2 rupees to the gram seller in return of the price of 1 paisa grams.

Swami Vivekananda was also a true devotee of his motherland. Once when he was returning to India from a foreign trip, there were 2 people with him who belonged to the Christian religion. Some conversation started and a comparison between Hinduism and Christianity started. Vivekananda argued with them about Hinduism. Both of them did not have any answer to Swamiji’s arguments. Considering Swamiji’s arguments as their condemnation, both of them started saying bad things about Hinduism and its followers. So Swamiji sat with a completely calm mind. Even after this, when those two people did not keep quiet, Swamiji could not stop himself. Holding the collar of the one who was talking too much, Swamiji said, “You have slandered my religion enough. If you slander my Hindu religion after this moment, I will throw you off the ship.” Seeing this sudden change in Swamiji, who was sitting with a calm nature, both the persons got scared and started asking him for forgiveness.

When Swamiji returned from the journey and told this incident of the ship to his friend, his friend said to him, “You are a sanyasi, such aggressive behavior does not suit you.” On this, Swamiji said very firmly, “This land and its culture is my mother. I will never forgive anyone who insults it. First of all, I am the son of the divine land of my nation India, after that I am a sanyasi.” This statement of Swamiji will always remain alive as an ideal for all of us Indians.

The king of Khetri, who was a very dear friend of Swamiji, organized a program to welcome Swamiji. He arranged a court in which a singer was invited for dance and music. Now how could Swamiji, being a sanyasi, watch dance and music? Thinking about this, Swamiji did not go to the gathering. When the singer came to know about this, she became very sad. She started singing the song ‘Prabhu More Avgun Chit Na Dharo’ in a very compassionate voice. When this song reached Swamiji’s ears, his inner consciousness told him – that it is not appropriate for a sanyasi to discriminate among humans. Swamiji went to the gathering immediately and after the meeting was over, he honored the singer by calling her ‘Mata’.

I hope that all of you would have felt very happy after reading some part of the holy pastimes of our great saint Shri Swami Vivekanandji. Please bow down to the feet of the great saints through comments.

Gratitude and thanks.

– Guru Satyaram