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भारत के महान एवम दिव्य संत- संत श्री कबीरजी {Hindi & English}

भारत के महान एवम दिव्य संत- संत श्री कबीरजी {Hindi & English}

Om-Shiva

बाबा कबीर एक महान संत थे। जैसा की विदित है कि, गुरु के बिना गति संभव नहीं है। इसलिए अपने साधनाकाल की शुरुआत हेतु उन्हें भी सदगुरुदेव की आवश्यकता थी। कबीरजी श्री रामानंदजी को अपना गुरु बनाना चाहते थे। श्री रामानंदजी धर्म से हिंदू थे और कबीरजी मुस्लिम। कबीरजी ने उनसे भेंट करने का हर संभव प्रयास किया लेकिन धर्म के रूप में एक अदृश्य दीवार हमेशा उनका यह मार्ग रोकती ही रही। लेकिन अपने हृदय की अति शुद्ध भावना के चलते कबीरजी ने श्री रामानंदजी से मिलने का एक विचित्र मार्ग खोज ही लिया।

गुरु श्री रामानंदजी नित्य प्रातः समय गंगा स्नान के लिए जाते थे। एक रात्रि की बात है जब कबीरजी उनकी कुटिया के बाहर दरवाजे के मार्ग में लेट गए। श्री रामानंदजी प्रातः समय उठते ही ज्यों ही गंगा स्नान को निकले त्यों ही उनके श्री चरण कबीरजी के शरीर पर पड़ गए। ऐसा होते ही गुरमुख से निकला पवित्र नाम ‘राम-राम’। ऐसा होने के पश्चात कबीरजी की खुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं रहा। क्योंकि उन्हें सदगुरु देव के श्री चरणों की प्राप्त हो गई थी और पावन गुरु मंत्र भी। उसके बाद कबीरजी ने हर क्षण ‘राम-राम’ का जाप करना शुरू कर दिया।

उसके बाद से कबीरजी स्वयं को श्री रामानंदजी का शिष्य बताने लगे। वे ‘राम-राम’ जपने लगे। जब लोगों ने श्री रामानंदजी से पूछा कि एक मुस्लिम धर्म के व्यक्ति को आपने अपना शिष्य कैसे बनाया? तो यह बात सुनकर श्री रामानंदजी अत्यंत आश्चर्य चकित हुए। उन्होंने भरी सभा के सम्मुख कबीरजी को बुलवाया और पूछा कि, वह उनके शिष्य कब बने?

जब कबीरजी ने उस दिन की घटना सबके सामने बताई तो श्री रामानंदजी अत्यंत क्रोध में आकर बोले यह तो सरासर धोखा है। इसके बाद ‘राम-राम’ कहकर उन्होंने अपनी खड़ाऊँ कबीरजी के ऊपर उछाल दीं। इस पर कबीरजी ने उन्हें प्रणाम करके कहा – गुरुदेव, उस दिन ना सही लेकिन आज तो सभी के सामने आपने मुझे अपना शिष्य मान ही लिया है। और मुझे फिर से अपने श्री चरणों की धूलि और ‘राम-राम’ रूपी अमृतमय मंत्र दे दिया है। उनके ऐसा कहते ही श्री रामानंदजी जान गए कि कबीरजी कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। उन्होंने कबीरजी को अपने गले से लगा लिया और श्री रामानंदजी ने कबीरजी को अपना सबसे अच्छे शिष्य के रूप में स्वीकार किया।

संत कबीर जुलाहे का काम करते थे। वह गरीब थे इसके पश्चात भी गरीबों की सेवा का एक भी मौका अपने हाथ से नहीं जाने देते थे। उनका मानना था कि अपने काम से सत्यप्रेम करना ही ईश्वरी सत्ता की सच्ची एवं श्रेष्ठ पूजा तथा भक्ति है। एक बार की बात है जब कबीरजी कपड़े की बुनाई कर रहे थे तब एक दुखी भिखारी उनके पास आया और उसने कबीरजी से अपने शरीर को ढकने के लिए एक कपड़े की मांग करी। कबीरजी ने बड़ी प्रसन्नता के साथ अपने बने हुए कपड़े का आधा थान उसे दे दिया। कबीरजी की उदारता को देखते हुए उनके पास दो से तीन भिखारी और आ गए। कबीरजी ने बचा हुआ थान उन सभी में बांट दिया। अब कपड़ा नहीं बेच पाने के कारण से उन्हें और उनके परिवार को पूरे दो दिनों तक भूखा रहना पड़ा। इसके पश्चात भी कबीरजी के माथे पर कोई शिकन नहीं आई।

आशा है कि आप सभी को हमारे महान संत श्री कबीरदासजी की पावन लीलाओं का कुछ अंश पढ़कर अत्यंत सुख पहुंचा होगा। कृपया कमेंट्स के माध्यम से श्रेष्ठ संतजनों के श्री चरणों में प्रणाम अवश्य करें।

धन्यवाद और आभार। 

– गुरु सत्यराम

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Great & Divine Saints of Bharat – Sant Shri Kabir Ji {Hindi & English}

Om-Shiva

Baba Kabir was a great saint. As it is known that, progress is not possible without a Guru. Therefore, he also needed a Sadgurudev to start his Sadhana period. Kabir Ji wanted to make Shri Ramanand Ji his Guru. Shri Ramanand Ji was a Hindu by religion and Kabir Ji was a Muslim. Kabir Ji made every possible effort to meet him but an invisible wall in the form of religion always kept blocking his path. But due to the very pure feelings of his heart, Kabir Ji found a strange way to meet Shri Ramanand Ji.

Guru Shri Ramanand Ji used to go to take a bath in the Ganga every morning. It is a matter of one night when Kabir Ji lay down in the doorway outside his hut. As soon as Shri Ramanand Ji woke up in the morning and went out to take a bath in the Ganga, his feet fell on Kabir Ji’s body. As soon as this happened, the holy name ‘Ram-Ram’ came out of the Guru’s mouth. After this happened, Kabirji’s happiness knew no bounds. Because he had attained the feet of Sadguru Dev and also the holy Guru Mantra. After that Kabirji started chanting ‘Ram-Ram’ every moment.

After that Kabirji started calling himself a disciple of Shri Ramanandji. He started chanting ‘Ram-Ram’. When people asked Shri Ramanandji that how did you make a person of Muslim religion your disciple? Hearing this, Shri Ramanandji was very surprised. He called Kabirji in front of the full assembly and asked, when did he become his disciple?

When Kabirji told the incident of that day in front of everyone, Shri Ramanandji got very angry and said that this is a complete fraud. After this, saying ‘Ram-Ram’, he threw his sandals on Kabirji. On this Kabirji bowed to him and said – Gurudev, even if not that day, today in front of everyone you have accepted me as your disciple. And you have once again given me the dust of your feet and the nectar-like mantra of ‘Ram-Ram’. As soon as he said this, Shri Ramanandji realized that Kabirji was no ordinary person. He embraced Kabirji and Shri Ramanandji accepted Kabirji as his best disciple.

Saint Kabir used to work as a weaver. He was poor and yet he never missed a single opportunity to serve the poor. He believed that loving truth through one’s work is the true and best worship and devotion of the divine power. Once when Kabirji was weaving clothes, a sad beggar came to him and asked Kabirji for a piece of cloth to cover his body. Kabirji happily gave him half of the cloth he had made. Seeing Kabirji’s generosity, two to three more beggars came to him. Kabirji distributed the remaining piece of cloth among all of them. Now, due to not being able to sell the cloth, he and his family had to remain hungry for two whole days. Even after this, there was no wrinkle on Kabir’s forehead.

I hope you all will be very happy to read some parts of the holy pastimes of our great saint Shri Kabirdasji. Please bow down to the feet of the great saints through comments.

Thanks and gratitude.

– Guru Satyaram